बेकार है वह उपलब्धियां जिनका जश्न मनाने के लिए…

बेकार है वह उपलब्धियां जिनका जश्न मनाने के लिए कोई अपना आपके साथ ना खडा हो:

संबंधो में प्रेम हो या ना हो लेकिन समर्पण और सम्मान ज़रूर होना चाहिए। अपनों के सुख में भागीदार बने या ना बने लेकिन दुख में उनका साथ देना हमारी ज़िम्मेदारी भी है और ज़रूरत भी। क्योकि दो कौडी की भी नहीं रह जाती वह सफलता या धन सम्पदा, जिसके मिलने की बधाई देने या साथ मिलकर जश्न मनाने के लिए, कोई करीबी अथवा परिवार के सदस्य आपको इंतज़ार करते ना मिले |

अक्सर संघर्ष के समय में हम अपनो से रुखा व्यवहार करते रहते है, उन्हें समय नहीं दे पाते, उनकी भावना को समझे बिना, उन्हें स्वयं से दूर रहने को कहते है |
हमारे अपने हमें सफल देखना चाहते है किन्तु वे यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते कि उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाये, उनकी भावना की अवहेलना की जाये | वे बेशक हमारे संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा नहीं लेते, लेकिन यही वे लोग होते है, जो पीछे से हमे मानसिक समर्थन देते है, हमें प्रेरित करते है
हमारे अपनो से मिली शाबाशी ही हमारी सफलता अथवा मिले मान सम्मान का असली मज़ा होता है | लेकिन ज्यादातर मामलो में अपनी सफलता तक हम अपनों को नाराज़ कर चुके होते है, उन्हें खो चुके होते है
मेरे इस विचार से आप सहमत हो या ना हो लेकिन हकीकत यही है, इसलिए नये संबंधी/ दोस्त बनाने से पहले पुराने और असली संबंधो को बचाए, साथ बैठे और उनका सुख – दुख जाने एवम् अपना बताए |

आज की गला काट प्रतिस्पर्धा में, आँख मूंदकर दौड़ते रहने से, सब पाकर भी, अपने आप को, अपनों को खो देने का डर हमेशा बना रहेगा | आगे आप ज्यादा समझदार है  

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