150+ Best Ghazal Shayari in Hindi – Ghalib, Mir, Iqbal Ke Sher

Ghazal Shayari in Hindi ki talaash mein hain? ग़ज़ल उर्दू-हिंदी अदब की वो सबसे ख़ूबसूरत सिन्फ़ है जिसमें इश्क़, दर्द, ज़िंदगी और फ़लसफ़े की बात दो-दो लाइनों में इस तरह कही जाती है कि बात सीधे दिल में उतर जाए। इस पोस्ट में हम आपके लिए लाए हैं 150 बेहतरीन ग़ज़ल शायरी कोट्स — मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर तक़ी मीर, अल्लामा इक़बाल, दाग़ देहलवी और मोमिन ख़ान मोमिन जैसे क्लासिकी उस्तादों के असली और मशहूर अशआर, सही नाम के साथ। ये सारी शायरी क्लासिकी उर्दू अदब की धरोहर है और आज भी उतनी ही ताज़ा और असरदार है जितनी सदियों पहले थी।

इस पोस्ट में क्या-क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब की 35 बेहतरीन शायरी

मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ग़ालिब (1797–1869) उर्दू और फ़ारसी के सबसे बड़े शायरों में गिने जाते हैं। दिल्ली में पले-बढ़े ग़ालिब की शायरी दर्शन, इश्क़, ज़िंदगी और मौत के फ़लसफ़े को बड़ी सादगी और गहराई से बयान करती है। उनका “दीवान-ए-ग़ालिब” आज भी उर्दू-हिंदी ग़ज़ल का सबसे पढ़ा जाने वाला संग्रह है।

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ ने ‘ग़ालिब’ निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

— मिर्ज़ा ग़ालिब

पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

— मिर्ज़ा ग़ालिब

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

— मिर्ज़ा ग़ालिब

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

— मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

— मिर्ज़ा ग़ालिब

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

— मिर्ज़ा ग़ालिब

जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

— मिर्ज़ा ग़ालिब

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

— मिर्ज़ा ग़ालिब

बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं ‘ग़ालिब’
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था

— मिर्ज़ा ग़ालिब

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ

— मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

— मिर्ज़ा ग़ालिब

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती

— मिर्ज़ा ग़ालिब

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’
शर्म तुम को मगर नहीं आती

— मिर्ज़ा ग़ालिब

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ‘ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं

— मिर्ज़ा ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

— मिर्ज़ा ग़ालिब

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

— मिर्ज़ा ग़ालिब

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता

— मिर्ज़ा ग़ालिब

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

— मिर्ज़ा ग़ालिब

तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

— मिर्ज़ा ग़ालिब

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

— मिर्ज़ा ग़ालिब

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना

— मिर्ज़ा ग़ालिब

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

— मिर्ज़ा ग़ालिब

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और

— मिर्ज़ा ग़ालिब

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे

— मिर्ज़ा ग़ालिब

मीर तक़ी ‘मीर’ की 30 बेहतरीन शायरी

मीर तक़ी मीर (1723–1810) को “ख़ुदा-ए-सुख़न” (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है। दिल्ली से लखनऊ तक का सफ़र तय करने वाले मीर की शायरी दर्द, तन्हाई और इश्क़ की सादा मगर असरदार ज़बान के लिए मशहूर है। ग़ालिब ख़ुद भी मीर को अपना उस्ताद मानते थे।

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है

— मीर तक़ी ‘मीर’

राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या

— मीर तक़ी ‘मीर’

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

— मीर तक़ी ‘मीर’

कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है

— मीर तक़ी ‘मीर’

अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया

— मीर तक़ी ‘मीर’

हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

— मीर तक़ी ‘मीर’

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

— मीर तक़ी ‘मीर’

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

— मीर तक़ी ‘मीर’

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का

— मीर तक़ी ‘मीर’

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

— मीर तक़ी ‘मीर’

मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिस के सबब
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं

— मीर तक़ी ‘मीर’

याद उस की इतनी ख़ूब नहीं ‘मीर’ बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा

— मीर तक़ी ‘मीर’

बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो

— मीर तक़ी ‘मीर’

फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

— मीर तक़ी ‘मीर’

फिरते हैं ‘मीर’ ख़्वार कोई पूछता नहीं
इस आशिक़ी में इज़्ज़त-ए-सादात भी गई

— मीर तक़ी ‘मीर’

इश्क़ इक ‘मीर’ भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

— मीर तक़ी ‘मीर’

शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का

— मीर तक़ी ‘मीर’

सिरहाने ‘मीर’ के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है

— मीर तक़ी ‘मीर’

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

— मीर तक़ी ‘मीर’

क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़

— मीर तक़ी ‘मीर’

रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना

— मीर तक़ी ‘मीर’

बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना

— मीर तक़ी ‘मीर’

‘मीर’ उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

— मीर तक़ी ‘मीर’

‘मीर’ साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ

— मीर तक़ी ‘मीर’

दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

— मीर तक़ी ‘मीर’

क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता
अब तो चुप भी रहा नहीं जाता

— मीर तक़ी ‘मीर’

अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे

— मीर तक़ी ‘मीर’

शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए

— मीर तक़ी ‘मीर’

इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ

— मीर तक़ी ‘मीर’

मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

— मीर तक़ी ‘मीर’

अल्लामा इक़बाल की 25 बेहतरीन शायरी

अल्लामा मुहम्मद इक़बाल (1877–1938), “शायर-ए-मशरिक़” (पूरब का शायर), फ़लसफ़ी और शायर दोनों थे। “ख़ुदी” यानी आत्म-सम्मान और आत्म-शक्ति के फ़लसफ़े पर लिखी उनकी शायरी नौजवानों को हौसला और जोश देने के लिए आज भी पढ़ी जाती है। “सारे जहाँ से अच्छा” जैसी रचनाएँ उन्हीं की देन हैं।

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

— अल्लामा इक़बाल

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

— अल्लामा इक़बाल

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

— अल्लामा इक़बाल

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

— अल्लामा इक़बाल

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

— अल्लामा इक़बाल

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़िंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

— अल्लामा इक़बाल

नहीं है ना-उमीद ‘इक़बाल’ अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी

— अल्लामा इक़बाल

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है

— अल्लामा इक़बाल

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में

— अल्लामा इक़बाल

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

— अल्लामा इक़बाल

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

— अल्लामा इक़बाल

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

— अल्लामा इक़बाल

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

— अल्लामा इक़बाल

फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है

— अल्लामा इक़बाल

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

— अल्लामा इक़बाल

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

— अल्लामा इक़बाल

ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीन पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

— अल्लामा इक़बाल

यक़ीन मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें

— अल्लामा इक़बाल

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है
तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में

— अल्लामा इक़बाल

तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की
नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में

— अल्लामा इक़बाल

निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए

— अल्लामा इक़बाल

इल्म में भी सुरूर है लेकिन
ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं

— अल्लामा इक़बाल

ढूँडता फिरता हूँ मैं ‘इक़बाल’ अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं

— अल्लामा इक़बाल

अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है
शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात

— अल्लामा इक़बाल

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

— अल्लामा इक़बाल

दाग़ देहलवी की 30 बेहतरीन शायरी

नवाब मिर्ज़ा ख़ान ‘दाग़’ देहलवी (1831–1905) दिल्ली की ठेठ, रोज़मर्रा की ज़बान को ग़ज़ल में ढालने के उस्ताद माने जाते हैं। उनकी शायरी में इश्क़-ओ-मोहब्बत की शोख़ी, चुटीलापन और ज़बान का सलीक़ा एक साथ मिलता है, यही वजह है कि उनके शेर आज भी उतने ही ताज़ा लगते हैं।

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

— दाग़ देहलवी

हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के ‘दाग़’
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

— दाग़ देहलवी

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था

— दाग़ देहलवी

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

— दाग़ देहलवी

उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं ‘दाग़’
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है

— दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं

— दाग़ देहलवी

हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना

— दाग़ देहलवी

आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले

— दाग़ देहलवी

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे

— दाग़ देहलवी

ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं

— दाग़ देहलवी

इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं

— दाग़ देहलवी

आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता

— दाग़ देहलवी

ग़ज़ब किया तिरे वअ’दे पे ए’तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

— दाग़ देहलवी

ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में

— दाग़ देहलवी

लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे

— दाग़ देहलवी

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

— दाग़ देहलवी

कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो
दो दिन में ये मिज़ाज है आगे की ख़ैर हो

— दाग़ देहलवी

आप का ए’तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे

— दाग़ देहलवी

हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल
हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं

— दाग़ देहलवी

बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा
वो मिन्नतों से कहें चुप रहो ख़ुदा के लिए

— दाग़ देहलवी

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा

— दाग़ देहलवी

बात तक करनी न आती थी तुम्हें
ये हमारे सामने की बात है

— दाग़ देहलवी

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं

— दाग़ देहलवी

हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है

— दाग़ देहलवी

चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़
तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद

— दाग़ देहलवी

ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं
इस दिल को क्या करूँ ये बहलता कहीं नहीं

— दाग़ देहलवी

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था

— दाग़ देहलवी

ज़िद हर इक बात पर नहीं अच्छी
दोस्त की दोस्त मान लेते हैं

— दाग़ देहलवी

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

— दाग़ देहलवी

यूँ भी हज़ारों लाखों में तुम इंतिख़ाब हो
पूरा करो सवाल तो फिर ला-जवाब हो

— दाग़ देहलवी

मोमिन ख़ान ‘मोमिन’ की 30 बेहतरीन शायरी

मोमिन ख़ान मोमिन (1800–1852) ग़ालिब के समकालीन थे और पेशे से हकीम भी। उनकी शायरी में इश्क़ की शिद्दत और तसव्वुफ़ (सूफ़ी रंग) एक साथ नज़र आते हैं। कहा जाता है कि ग़ालिब ने मोमिन के एक शेर के बदले अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी।

तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

‘उम्र सारी तो कटी ‘इश्क़-ए-बुताँ में ‘मोमिन’
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब
वो आए तो भी नींद न आई तमाम शब

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

क्या जाने क्या लिखा था उसे इज़्तिराब में
क़ासिद की लाश आई है ख़त के जवाब में

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

मैं भी कुछ ख़ुश नहीं वफ़ा कर के
तुम ने अच्छा किया निबाह न की

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

शब जो मस्जिद में जा फँसे ‘मोमिन’
रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की
आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

चल दिए सू-ए-हरम कू-ए-बुताँ से ‘मोमिन’
जब दिया रंज बुतों ने तो ख़ुदा याद आया

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह
अटका कहीं जो आप का दिल भी मिरी तरह

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में
लो आप अपने दाम में सय्याद आ गया

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

आप की कौन सी बढ़ी इज़्ज़त
मैं अगर बज़्म में ज़लील हुआ

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

किस पे मरते हो आप पूछते हैं
मुझ को फ़िक्र-ए-जवाब ने मारा

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

किसी का हुआ आज कल था किसी का
न है तू किसी का न होगा किसी का

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम
पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

है कुछ तो बात ‘मोमिन’ जो छा गई ख़मोशी
किस बुत को दे दिया दिल क्यूँ बुत से बन गए हो

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर
हाथ दिल से जुदा नहीं होता

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

हँस हँस के वो मुझ से ही मिरे क़त्ल की बातें
इस तरह से करते हैं कि गोया न करेंगे

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

न करो अब निबाह की बातें
तुम को ऐ मेहरबान देख लिया

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं
सो तुम्हारे सिवा नहीं होता

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

डरता हूँ आसमान से बिजली न गिर पड़े
सय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

मज्लिस में मिरे ज़िक्र के आते ही उठे वो
बदनामी-ए-उश्शाक़ का एज़ाज़ तो देखो

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

माशूक़ से भी हम ने निभाई बराबरी
वाँ लुत्फ़ कम हुआ तो यहाँ प्यार कम हुआ

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

‘मोमिन’ ख़ुदा के वास्ते ऐसा मकाँ न छोड़
दोज़ख़ में डाल ख़ुल्द को कू-ए-बुताँ न छोड़

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

क्या मिला अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के
बात भी खोई इल्तिजा कर के

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

कल तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए
खोए गए हम ऐसे कि अग़्यार पा गए

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

ग़ैरों पे खुल न जाए कहीं राज़ देखना
मेरी तरफ़ भी ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़ देखना

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

हो गया राज़-ए-इश्क़ बे-पर्दा
उस ने पर्दे से जो निकाला मुँह

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

सोज़-ए-ग़म से अश्क का एक एक क़तरा जल गया
आग पानी में लगी ऐसी कि दरिया जल गया

— मोमिन ख़ान ‘मोमिन’

कुल मिलाकर ये रहे हमारे 150 चुनिंदा शेर — पाँच महान क्लासिकी शायरों की तरफ़ से इश्क़, दर्द, ख़ुद्दारी और ज़िंदगी के फ़लसफ़े पर लिखी गई बेहतरीन शायरी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

ग़ज़ल शायरी किसे कहते हैं?

ग़ज़ल शेरों (दो-दो लाइनों के छंद) का एक सिलसिला होती है जिसमें हर शेर अपने आप में मुकम्मल ख़याल पेश करता है, लेकिन सारे शेर एक ही बहर (लय) और क़ाफ़िया-रदीफ़ में बंधे होते हैं। इश्क़, जुदाई, फ़लसफ़ा और समाज — ग़ज़ल का मौज़ू कुछ भी हो सकता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब का सबसे मशहूर शेर कौन सा है?

“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले” और “हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन, दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है” ग़ालिब के सबसे ज़्यादा पढ़े और शेयर किए जाने वाले शेरों में शामिल हैं।

मीर तक़ी मीर को “ख़ुदा-ए-सुख़न” क्यों कहा जाता है?

मीर तक़ी मीर की सादा मगर गहरी शायरी ने उर्दू ग़ज़ल की बुनियाद मज़बूत की। उनकी ज़बान की रवानी और दर्द को बयान करने के अंदाज़ की वजह से बाद के शायरों — ख़ुद ग़ालिब समेत — ने उन्हें अपना उस्ताद माना, इसीलिए उन्हें “ख़ुदा-ए-सुख़न” यानी शायरी का ख़ुदा कहा जाता है।

क्या ये सारी शायरी असली और प्रामाणिक (authentic) है?

हाँ। इस पोस्ट के सभी शेर क्लासिकी दीवानों और रेख़्ता जैसे भरोसेमंद उर्दू अदब के स्रोतों से लिए गए हैं और सही शायर के नाम के साथ दिए गए हैं।

उम्मीद है इश्क़, दर्द और ज़िंदगी के फ़लसफ़े पर लिखी गई ये क्लासिकी ग़ज़ल शायरी आपको पसंद आई होगी। अपनी पसंदीदा शायरी कमेंट में ज़रूर बताएं, और अगर पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।